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Thursday, June 30, 2011

0 भारत में क्‍यों है भ्रष्‍टाचार? सिंगापुर में छिपा है जवाब

नई दिल्ली. भारत में भ्रष्‍टाचार आज सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इससे देश का हर शख्‍स प्रभावित है। लेकिन सिंगापुर में भ्रष्‍टाचार सबसे कम है। 
 
दुनिया के 178 देशों में सबसे कम भ्रष्टाचार डेनमार्क, न्यूजीलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की तरफ से जारी 2010 करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) के मुताबिक डेनमार्क, न्यूजीलैंड और सिंगापुर 9.3 अंकों के साथ संयुक्त रूप से शीर्ष पर हैं। इसके उलट, अराजकता वाले अफ्रीकी देश सोमालिया सबसे 'भ्रष्ट' देश बताया गया है। दस अंकों के स्केल पर सोमालिया को सबसे कम 1.1 अंक मिले हैं। 
 
सिंगापुर के हाल के बहाने हम समझ सकते हैं कि भारत में भ्रष्‍टाचार की वजह क्‍या हो सकती है?
सिंगापुर क्यों है सबसे कम भ्रष्ट? 
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक मध्यम आकार की अर्थव्यवस्था, राजनीतिक स्थिरता, कम आबादी जैसे कारकों की वजह से सिंगापुर जैसे देशों में सबसे कम भ्रष्टाचार है। 
 
एक ही पार्टी सत्ता में
सिंगापुर में भ्रष्टाचार कम होने के पीछे राजनीतिक स्थिरता भी एक अहम कारक है। यहां 1959 से एक ही पार्टी पीपल्स एक्शन पार्टी का शासन रहा है। इस पार्टी की सरकार सिंगापुर की आज़ादी से पहले से ही सत्ता पर काबिज है, जब सिंगापुर स्वायत्त ब्रिटिश उपनिवेश था। इसी पार्टी के नेता ली कुअन ये 1959 से 1990 तक सिंगापुर के प्रधानमंत्री रहे। कुअन तो यहां तक मानते थे कि बेहतर लोकतंत्र आर्थिक तरक्की के रास्ते में रोड़ा बनता है। हालांकि, एक ही पार्टी के इतने लंबे समय तक प्रभुत्व को कई जानकार लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं मानते हैं। वे मानते हैं कि सिंगापुर में उदार लोकतांत्रिक सरकार नहीं है। 
 
कम आबादी
2005
में हुई आखिरी जनगणना के मुताबिक सिंगापुर की आबादी 44.80 लाख है, जो कई देशों की तुलना में काफी कम है। यही स्थिति डेनमार्क और न्यूजीलैंड की भी है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के जिन देशों भ्रष्टाचार कम है, वहां आबादी भी कम है।
 
कड़े कानून, फांसी की दर ज़्यादा
सिंगापुर में अपराधों के लिए कड़ी सज़ा देने का कानून है। यहां हत्या, नशीली दवाओं के कारोबार और कुछ खास किस्म के हथियारों को रखने पर फांसी की सज़ा दी जाती है। सिंगापुर में आबादी के हिसाब से दुनिया में सबसे ज़्यादा फांसी की सज़ा दी जाती है।  2010 में सिंगापुर में 8 लोगों को सज़ा-ए-मौत सुनाई गई। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े के मुताबिक सिंगापुर में 1994 और 1999 के बीच फांसी की दर दुनिया में सबसे ज़्यादा थी। उस दौरान सिंगापुर में हर एक लाख की आबादी पर 1.357 लोगों को फांसी दी गई। 
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी सिंगापुर में फांसी दिए जाने की दर को दुनिया में सबसे ज़्यादा बताया है। 2004 में जारी एमनेस्टी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1991 से 2004 के बीच सिंगापुर में 400 लोगों को फांसी की सज़ा दी गई। सबसे ज्यादा फांसी देने वाले देशों की सूची में दूसरे नंबर पर रहे सऊदी अरब की तुलना में यह आंकड़ा 13 गुना ज़्यादा था। सिंगापुर के गृह मंत्रालय के मुताबिक 1999 और 2003 के बीच 138 लोगों को सज़ा-ए-मौत दी गई। सिर्फ 2000 में ही 21 लोगों को फांसी की सज़ा दी गई थी। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार से जुड़ी चिंताओं के जवाब में सिंगापुर सरकार ने इसी साल फरवरी में अपना बचाव करते हुए कहा था कि वह मौत की सज़ा को मानवाधिकार का नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था का मामला मानती है। सिंगापुर के कड़े कानूनों का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वहां बलात्कार, दंगा, तोड़फोड़ जैसे अपराधों के लिए बेंत मारने की सज़ा दी जाती है। इस तरह की सजा दूसरे संपन्‍न देशों में बहुत कम ही देखने को मिलती है।     
 
उत्तर और दक्षिण एशिया में सबसे बेहतर नौकरशाही
नौकरशाही के कामकाज के तरीके, क्षमता और पारदर्शिता को लेकर 2009 में पर्क द्वारा कराए गए एक सर्वे में सिंगापुर को उत्तर और दक्षिण एशियाई मुल्कों में पहला स्थान दिया गया था। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसी सर्वे में भारत को आखिरी स्थान दिया गया था।  
 
दरअसल, सिंगापुर सरकार ने नौकरशाही के कामकाज के तौर तरीकों को बेहतर करने, उनकी क्षमता बढ़ाने और ज़्यादा से ज़्यादा पारदर्शी व्यवस्था अपनाने के लिए नौकरशाही के सिस्टम में कई आमूलचूल बदलाव किए। नौकरशाही में पहले से फैली सांगठनिक जकड़न, पारदर्शिता की कमी, पदानुक्रम को लेकर रक्षात्मक भाव को दूर करने के लिए सिंगापुर सरकार ने हाल के कुछ सालों में बड़े बदलाव किए हैं। आधुनिक पूंजीवादी देशों में 1980 और 1990 के दशकों में विकसित हुए प्रबंधन के नए तरीके को सिंगापुर ने अपनाया। इसके तहत विभिन्न विभागों, मंत्रालयों और एजेंसियों को स्वायत्त एजेंसी में तब्दील किया। सिंगापुर सरकार ने इन स्वायत्त एजेंसियों को बहुत ज़्यादा वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार दिए। उन्हें अंतिम नतीजों के आधार पर नीतियां बनाने को कहा गया। 
 
सिंगापुर में पीडब्लूडी, पब्लिक यूटीलिटी बोर्ड, हाउसिंग और डेवलपमेंट बोर्ड, इनलैंड रेवेन्यू अथॉरिटी, पोर्ट अथॉरिटी, ब्रॉडकास्टिंग अथॉरिटी और लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी ऐसी ही स्वायत्त एजेंसियां हैं।  
 
इसी तरह से 90 के दशक में सिंगापुर सरकार ने मंत्रालयों और संवैधानिक बोर्डों में भर्ती के तरीके को बदल दिया था। इसके तहत भर्ती की प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण कर दिया गया था। इस बदलाव के बाद मंत्रालय और बोर्ड अपने स्तर पर निचले और मझले स्तर की भर्तियां करने लगे थे। इसी तरह से नियमों में बदलाव के चलते निजी क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकारियों को किसी भी स्तर पर सरकारी सेवा में अवसर देने का रास्ता भी खोला गया। सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में स्थायी नौकरियों की जगह तय मियाद के कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर नौकरी देने का चलन भी सिंगापुर में बढ़ गया।  
 
सरकारी सिस्टम में शीर्ष पर बैठे अफसरों को बिजनेस एग्जीक्यूटिव की तरह पेश आने को कहा गया ताकि मानव संसाधन के प्रबंधन और कर्मचारियों के कामकाज के तरीके का वे बेहतर तरीके से आकलन और प्रबंधन कर सकें।  
 
95.9
फीसदी लोग पढ़े-लिखे
सिंगापुर में 2010 के आंकड़ों के मुताबिक 15 साल या इससे ऊपर आयु वर्ग में 95.9 फीसदी साक्षरता है, जो भारत से कहीं ज्‍यादा है।  
 
ज्‍यादा आय
सिंगापुर इस समय दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक है। कई पश्चिमी देशों के नागरिकों की तुलना में सिंगापुर के नागरिकों की आय ज़्यादा है।

Monday, May 9, 2011

0 काले धन पर टिका भारतीय प्रजातंत्र

 पीवी नरसिम्हाराव के समय की एक बात हमेशा याद आती है. दो पत्रकारों को बात करते सुना था. एक ने दूसरे से कहा कि उसने शेयर बाज़ार घोटाले के एक आरोपी को प्रधानमंत्री के पास चार करोड़ रुपये ले जाते देखा था. दूसरे ने तपाक से कहा कि उसे विश्वास नहीं होता, क्योंकि प्रधानमंत्री इतनी छोटी रकम पर तो छींक भी नहीं मारेंगे. मुझे याद है कि इस बातचीत पर मुझे गुस्सा नहीं, बल्कि हंसी आई थी. आज हम उस समय से बहुत आगे आ गए हैं. हम सभी को याद है कि किस तरह राव सरकार के समय झारखंड मुक्ति मोर्चा के वोटों को भारी-भरकम रकम देकर ख़रीदा गया था.
अब आज के विकीलीक्स को देखें. आज एक सांसद की क़ीमत कुछ करोड़ से बढ़कर दस और बीस करोड़ रुपये हो गई है. अमर सिंह, जो कि इस पूरे मामले में भीतर के आदमी थे, ने कहा है कि इसमें एक सांसद की क़ीमत दस नहीं, बल्कि बीस करोड़ रुपये थी. मुझे उनकी इस बात पर पूरा विश्वास है. आज क्या क़ीमत है, यह सोचने का विषय है. क्या बिकने की क़ीमतों ने महंगाई के साथ अपने क़दम बढ़ाए हैं या फिर बढ़े हुए एम पी फंड के साथ, जिसे वित्त मंत्री ने बहुत ही उदारता के साथ बढ़ाया है? वैसे अगली अर्थव्यवस्था के सर्वे में इस बात का भी ख़ुलासा होना चाहिए कि घूसखोरी की वजह से राजनीतिक जीवन कितना फायदेमंद हो गया है. मुझे लगता है कि इसमें अर्जित होने वाला फायदा अर्थव्यवस्था के बाक़ी किसी भी क्षेत्र से अधिक ही निकलेगा. जिस तरह से राजनीतिक दलों के पास पैसा आता है, वह काले धन की खुली कहानी है. लेकिन इसे कुछ अर्थशास्त्रीय तर्कों से देखा जा सकता है कि आख़िर मामला है क्या? राजनीति कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां प्रतिस्पर्धा साफ़-पाक होती है. अल्पाधिकार यहां का नियम है. बड़ी पार्टी चलाने के लिए बहुत सारे धन और बहुत सारे संसाधनों की जरूरत होती है. कांग्रेस ने तो बहुत ही कम शुल्क पर सदस्यता देने का चलन शुरू किया था, लेकिन इस धन से पार्टी नहीं चल सकती. बहुत ही कम राजनीतिक कंपनियों (पार्टियों) में ही स्पर्धा होती है. उनमें एंट्री बहुत ही कठिन और महंगी होती है. आप क्षेत्रीय जातीय पार्टियां भी बना सकते हैं, जैसे कि आरएलडी या आरजेडी. आपको बस चाहिए एक सधा हुआ वोट बैंक. जैसे ही आपके पास दो या तीन एमपी आए नहीं कि आपका धंधा चल निकलता है.
एक एमपी होने का फायदा आपके निकट संबंधियों और आपके परिवार को मिलता है, जो कि तमिलनाडु के एम करुणानिधि के मामले में कई पत्नियों के बहुत से बच्चों को भी मिलता है. लेकिन अगर आपने बाहरी लोगों को शामिल किया तो लेने के देने पड़ सकते हैं. शायद ए राजा का उदाहरण फिर कभी नहीं दोहराया जाएगा. कभीकभार ऐसा भी हो सकता है कि कोई बड़ा पूंजीपति पार्टी को बहुत सारा पैसा दे दे, ताकि उसे राज्यसभा का टिकट मिल जाए. ऐसा अभी भाजपा के एक मुख्यमंत्री को सरेआम कहते देखा गया, लेकिन हर बार की तरह उनकी बात को दूसरे अर्थों में लिया गया. बड़ी पार्टियों को बार-बार केंद्र या राज्यों में सत्ता जीतनी पड़ती है, ताकि पार्टी चलती रहे. लेकिन जब वे सत्तासीन हो जाती हैं तो उन्हें लूट का पैसा गठबंधन के उन सदस्यों के साथ बांटना पड़ता है, जो एटीएम मंत्रालयों की मांग करते हैं. लेकिन इतना कुछ होता है कि छोटी पार्टियों के एमपी, जो गठबंधन से बाहर होते हैं, को भी पटाया जा सकता है. इस तरह से एक पूरा राजनीतिक तंत्र ही काले धन को पैदा करता है और वितरित भी. यह सारा नगद पैसा होता है, जिस पर मुस्कराते हुए राष्ट्रपिता की तस्वीर होती है. आख़िर उन्हें याद करने का इससे बेहतर तरीक़ा तो हो ही नहीं सकता.
वैसे यह धन आता कहां से है? बड़े-बड़े उद्योगपतियों से लाइसेंस और परमिट की एवज़ में पैसा लेने की प्रथा तब शुरू हुई थी, जब इंदिरा गांधी ने अर्थव्यवस्था की कमान पूरी तरह से राज्य के अंतर्गत कर ली थी. समाजवाद तो भारत की राजनीति का जीवन था, लेकिन देश में एक ही पार्टी का एकाधिकार था. कांग्रेस की हार के बाद दूसरी पार्टियों ने भी इस प्रथा को बिना व़क्त गंवाए सीख लिया. भाजपा गठबंधन की तहलका मामले में हुई किरकिरी कौन भुला सकता है. तब तक आर्थिक उदारवाद ने लाइसेंस और परमिट की क़ीमतें तो और बढ़ा दी थीं. यहां काम कर रहा था वह समाजवाद, जो भारतीयता से ओतप्रोत था. भारत को मास्को के सोने या अमेरिका के डॉलरों की ज़रूरत नहीं है. भारत के पास अपना अलग और बहुत बड़ा धन का खज़ाना है, जिस पर देश का अद्वितीय राजतंत्र चल रहा है. अमर सिंह ने सही कहा.

मेघनाद देसाई –courtesy chauthi duniya

 


Thursday, April 21, 2011

0 Sonia Gandhi ka Achhar

Wednesday, January 19, 2011

0 280 लाख करोड़ का सवाल है ...

"भारतीय गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा"*  ये कहना है स्विस बैंक के डाइरेक्टर का. स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280 लाख करोड़ रुपये (280 ,00 ,000 ,000 ,000) उनके स्विस बैंक में जमा है. ये रकम इतनी है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है. या यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है. या यूँ भी कह सकते है कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है. ऐसा भी कह सकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा सकते है. ये रकम इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर महीने भी दिए जाये तो 60 साल तक ख़त्म ना हो.

यानी भारत को किसी वर्ल्ड बैंक से लोन लेने कि कोई जरुरत नहीं है. जरा सोचिये.. हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और नोकरशाहों ने कैसे देश को लूटा है और ये लूट का सिलसिला अभी तक 2010 तक जारी है. इस सिलसिले को अब रोकना बहुत ज्यादा जरूरी हो गया है. अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज करके करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा. मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे भ्रस्टाचार ने 280 लाख करोड़ लूटा है. एक तरफ 200 साल में 1 लाख करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64 सालों में 280 लाख करोड़ है. यानि हर साल लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा स्विस बैंक में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा करवाई गई है.

भारत को किसी वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है. सोचो की कितना पैसा हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ है. हमे भ्रस्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारीयों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार है. हाल ही में हुवे घोटालों का आप सभी को पता ही है - CWG घोटाला, जी स्पेक्ट्रुम घोटाला , आदर्श होउसिंग घोटाला ... और ना जाने कौन कौन से घोटाले अभी उजागर होने वाले है ........
Courtesy Indianleaks