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Friday, September 17, 2010

0 कामन लोगों का चूसा पैसा हुक्म रानों की जेब में!

: जिस मुल्‍क में सिर छिपाने की छत नहीं वहां अरबों का बना स्‍टेडियम कुछ दिन में टपकने लगता है : अब मध्‍यम वर्ग के रहने लायक नहीं बची दिल्‍ली : बीजिंग में ओलम्पिक खेलों का शानदार आयोजन और हमारे महान भारत में होने वाले कामनवेल्थ खेलों की तैयारी को लेकर मचा बवाल रह-रह मन में आ रहा है। भला आये भी कैसे ना, मीडिया से जो जुडा हूं। न्यूज चैनल भी देखता हूं, अखबारों पर भी निगाह दौड़ा ही लेता हूं। हर चैनल और अखबार कामनवेल्थ की तैयारियों में हो रहे महाघोटाले से भरे हैं। मुल्क की गरिमा से जुड़े इस आयोजन ने शुरू होने से पहले ही महान भारत की फजीहत पूरे विश्व के सामने कर डाली है। अभी तो खेल हुए ही नही है, आगाज ही जब इतना भयावह है तो अंजाम कैसा होगा, ख़ुदा ही जाने।
अभी-अभी एक न्यूज चैनल में कामनवेल्थ के महाघोटाले को लेकर हो रही बहस सुन रहा था। एक महाशय बीजिंग ओलम्पिक से हमारी तुलना कर रहे थे कि दूसरे महाशय ने तपाक से कह डाला चीन की क्यों तुलना कर रहे हैं। वहां तो विकास पहले से ही हुआ था, उन्हें करना ही क्या है। बस स्टेडियम ही तो बनाने थे, बना डाले। हमने तो फ्लाई ओवर, सड़कें, बसें न जाने क्या-क्या इंतजाम करने है। तभी याद आईं एक दौर में पढ़ी किताब 'अफीम युद्ध से मुक्ति तक', जिसमें 1940 से पहले के चीन को दर्शाया गया है। किस तरह विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला मुल्क अफीम के नशे में डूबा है।
अब जरा सोचिए 1940 के आस-पास कम से कम भारत को अफीमचियों का मुल्क तो नही कहा जाता था। लेकिन 1947 के बाद भारत में ऐसा क्या हो गया कि हम अपनी तुलना चीन से नही कर सकते और 1948 में एक संगठित मुल्क के रूप में वजूद मे आये चीनी आज खुद को अमेरिका से भी आगे देख रहे हैं। चीन में हुए बीजिंग और भारत में होने वाले कामनवेल्थ से कई चीजें साफ हो रही है। चीन और भारत कई मायनों में एक जैसे देश कहे जा सकते थे, हैं नहीं। लेकिन दोनों मुल्कों के रहनुमाओं में भारी अंतर भी देखने को मिल रहा है। मैं, भारत जैसे मुल्क की तुलना यूरोप और अमेरिका से नही कर रहा हूं। क्योंकि इन देशों ने वाकई में विकास की रफ्तार काफी पहले पकड़ ली थी। लेकिन हमारे हुक्मरानों को क्या हो गया है।
एक दौर में अफीमचियों का चीन आज विश्व का सिरमौर बनने को तैयार है और हम कहां है ? शीशे की तरह साफ हो गया है। जिस मुल्क में लोगों के लिए सर छुपाने को छत नसीब नही होती है, उसी मुल्क में अरबों की लागत से बने स्टेडियम, उदघाटन के पल भर में ही टपकने लगते है। मुल्क की अस्मिता की आड़ में हमारे हुक्मरानों ने आस्ट्रेलिया में हुए कामनवेल्थ की तुलना में दो गुना से भी ज्यादा पैसा बहा डाला है। जिसकी भरपाई दिल्ली में रहने वालों का खून चूस कर की जा रही है। जो दिल्ली कुछ सालों पहले तक मध्यम वर्ग के लिए रहने लायक थी। आज वो दुनिया का पांचवां महंगा शहर बन गया है। इन बेदर्द नेताओं की रहनुमाई में कैसे दिल्ली में जिन्दगी गुजर पायेगी समझ नही आ रहा है।
विश्व में किसी राष्ट्रीय आयोजन को लेकर इतना हो-हल्ला शायद ही कहीं मचा हो। लेकिन फिर भी केन्द्र से लेकर दिल्ली सरकार चुप है। सुरेश कलमाड़ी, जो इस महाघोटाले के नायक कहे जा रहे हैं, उन पर अभी भी कार्रवाई होती नही दिख रही है। तर्क है कि लास्ट टाइम में कैसे नये आदमी को कामनवेल्थ की बागड़ोर दे सकते है, ये कहना है हमारे खेल मंत्री गिल साहब का, जो खुद को तो ईमानदार दिखाते है, लेकिन भ्रष्ट्राचारियों को कुछ नही कहते है। गिल साहब जरा ये भी बता दीजिये अगर कहीं कलमाड़ी बीमार पड़ गये या फिर खुदा ना करे उन्हें कुछ हो गया तो, क्या आप कामनवेल्थ का आयोजन बंद कर देंगे।
चीन में भ्रष्‍टाचारियों को एक बार नही कई बार फांसी दी गई है। मैं फांसी की समर्थक नही हूं। लेकिन जब मुल्क में महाचोर खुले आम घूम रहे हों, घूम नही रहे है बल्कि हमारे बाप बन कर बैठे है, तो पल भर के लिए लगता है कि काश यहां भी किसी भ्रष्टाचारी को फांसी दी गई होती तो शायद कुछ डर तो लगता ऐसे महाभ्रष्टों को। लेकिन तब भी शायद ही कोई महाभ्रष्‍टाचारी फांसी चढ़ता। हां क्लर्क टाइप के छोटे-छोटे भ्रष्‍टाचारियों से जरूर फांसी पर चढ़ने वालों की तादात बढ़ जाती। सब जान  रहे हैं कामनवेल्थ के जरिये आयोजको से लेकर संबंधित नेताओं ने इतना कमा लिया है कि दसियों पीढी लुटाती भी रहे तो शायद ही खर्च हो। फिर कोई कुछ कहने और करने की नही सोच रहा है।
करप्शन को इतना खुला सपोट मेरे महान भारत से ज्यादा शायद कहीं मिले। विपक्ष का हल्ला सिर्फ इसलिए है कि सारी मलाई सत्ता पक्ष से जुड़े लोग अकेले कैसे खा रहे हैं। जरा सोचिए.. ये वो ही लोग है जो हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को पूरे मुल्क के सामने ईमानदारी और देशभक्ति कसमें खाते नही थकते हैं। लगता है इस मुल्क में कोई भी बड़ा आयोजन कुछ चुनिनंदा लोगों के मलाई खाने का मौका भर होता है। कामनवेल्थ में देश कितने मेडल लायेगा, कैसे अंकतालिका में हिन्दुस्तान आगे बढ़ेगा किसी को इसकी रत्ती भर भी फ्रिक नही है।
लूट की गंगा बह रही है, जो चाहे डुबकी लगा ले। न कोई रोकने वाला है, ना टोकने वाला। जिस प्रकार इन खेलों में करप्शन पर सभी दलों में आम सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है, उसे देखकर लग रहा है कि जल्द ही इस मुल्क में भ्रष्‍टाचार को मौलिक अधिकार का दर्जा मिल सकता है। तब शायद सीबीआई और विजिलेंस के लोग किसी बाबू को हजार रूपये की घूस लेने के आरोप में जेल में नहीं डाल पायेंगे। क्योंकि बड़ी मछलियों को पकड़ने की इन्होंने कभी जहमत ही नही उठाई। चलो कम से कम भ्रष्टाचार को मौलिक अधिकार का दर्जा मिलने पर इस मामले में तो देश में समाजवाद आ जायेगा। धन्य है, भारत मुल्क और उसके नेता। और हम भी।
लेखक विजय वर्धन उप्रेती.

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